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अंतरात्मा से साधना का समन्वय सौभाग्यदायी होता है : स्वामी चिदात्मन जी

अंतरात्मा से  साधना का समन्वय सौभाग्यदायी होता है : स्वामी चिदात्मन जी
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बेगूसराय। एएनएन (Action News Network)

चैत्र नवरात्र की पावन वेला एवं नव संवत्सर का प्रारंभ दोनों ही मानव जीवन के लिए शुभ संकेत साबित हो सकता है। 25 मार्च से शुरू हो चुकी चैती नवरात्र उल्लास और ऊर्जा के संधि काल के सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है। इस वर्ष नवरात्र की शुरुआत नोवल कोरोना वायरस के लॉकडाउन के बीच हुई है।

दुनिया कह रही है कि इस वायरस से बचाव का एकमात्र उपाय ईश्वर ही कर सकते हैं और जब चैत्र नवरात्र चल रही है तो सभी लोगों को अनिवार्य रूप से नवरात्र साधना का मर्म समझते हुए आराधना, पूजा और वातावरण शुद्धि के लिए हवन करना चाहिए। इस अवसर पर मंदिरों में तो भीड़ लगाकर पूजा-अर्चना नहीं हो रही है लेकिन बेगूसराय के पांच सौ से अधिक घरों में कलश स्थापित कर मां भगवती की पूजा अर्चना हो रही है।

गायत्री परिवार द्वारा भी कलश स्थापित करवा कर वातावरण शुद्धि के लिए प्रत्येक दिन हवन किया जा रहा है। सिमरिया घाट सिद्धाश्रम में भी प्रत्येक दिन कोरोना संक्रमण से मुक्ति के लिए विशेष जप, पूजा और हवन किए जा रहे हैं। सर्वमंगला सिद्धाश्रम सिमरिया के संस्थापक स्वामी चिदात्मन जी ने गुरुवार को मां के द्वितीय स्वरुप ब्रह्मचारिणी की उपासना के दौरान कहा कि सौभाग्य की प्राप्ति के लिए साधक विभिन्न प्रकार की कोशिश करते हैं लेकिन उनका अनुग्रह उसी को प्राप्त होता है जो साधना का समन्वय अपनी अंतरात्मा से करते हैं।

नव संवत्सर के काल में सौभाग्य और पात्रता को विकसित करने के लिए नियम एवं पूजा-विधानओं के साथ आंतरिक आधार भी जरूरी हैं। जब भी कोई श्रेष्ठ संकल्प लिया जाता है तो वह व्रत कहलाता है और व्रत के द्वारा मनुष्य लक्ष्य तक पहुंचने के लिए आत्मशक्ति संजोने का प्रयत्न करता है। यह प्रयत्न जितना दृढ़ होता है, व्यक्ति उतनी ही सुगमता तथा सफलता से जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सकता है।

व्रत का समुचित लाभ तभी मिल सकता है, जब वह उचित दिशा की ओर केंद्रित हों। व्रत-उपवास से जीवन का बिखराव थमता है और ऊर्जा परमात्मा की ओर नियोजित होती है। जीवन का हर कर्म, हर प्रयत्न व्रत हो सकता है, यदि उसमें ईश्वर से एक होने की आकांक्षा और आत्मा का तीव्र संकल्प समाहित हो। ऐसे में आत्मा, परमात्मा की ओर उन्मुख होकर और परिपूर्णता को प्राप्त करती है।

नवरात्र जप में मंत्र की सूक्ष्म तरंगेंं अंतःकरण को स्पंदित करती रहें और उसके अर्थ का चिंतन विचारों को परिपुष्ट बनाते रहने का मुख्य भाव होना चाहिए। जिनका हृदय तपस्या की रश्मियों से ओत-प्रोत है, अंतःकरण में ईश्वर या मिलन की अभिप्शा है, उनके लिए चैत्र संवत्सर एक नवीन जीवन का प्रारंभ हो सकता है। वैश्विक महामारी की इस आपदा वेला में ईश्वर सेे एकाकार होकर हम सबको विश्व शांति की कामना करनी चाहिए।

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