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एक नदी को तलाश है अपने जीवन की....

एक नदी को तलाश है अपने जीवन की....
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रायबरेली । एएनएन (Action News Network)

कभी जीवनदायिनी रही एक नदी को ख़ुद के जीवन की तलाश है।त्रेता युग से ही लोगों की आध्यात्मिक पिपासा को शांत करने वाली नदी को इंतजार है। किसी भगीरथ की और शताब्दियों से लोगों की समृद्धि और जीवन यापन में सहभागी बनी नदी को जरूरत है एक सहारे की। हरदोई के भिजवान झील से निकलने वाली पौराणिक और पवित्र नदी 'सई' रायबरेली में पूरी तरह से प्रदूषित है। सई की दुर्दशा का आलम यह है कि यह नदी कई स्थानों पर तो एक नाला बनकर जिले में बह रही है। 715 किमी लंबी यह नदी रायबरेली में क़रीब 150 किमी की दूरी तय करती है। फैक्ट्रियों का कचरा और नालों का अपशिष्ट समेट रही इस नदी का पानी बिल्कुल काला हो चुका है। गर्मियों की लगभग सूख जाने वाली सई बरसात में जरूर कहीं-कहीं अपने कुछ स्वाभाविक रुप में जरूर नजर आती है।

पौराणिक और आध्यत्मिक है 'सई' नदी

सई नदी का पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व है। त्रेता युग मे भी इसका वर्णन मिलता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अयोध्याकांड में उल्लेख करते हुए लिखा है कि 'सई उतरी गोमती नहाये, चौथे दिवस अवधपुर आये।'भगवान राम के जीवन से जुड़ी इस नदी के किनारे कई महत्वपूर्ण मंदिर है जहां आज भी श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। जिले के भवरेश्वर मंदिर, शनिदेव मंदिर आदि प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां विभिन्न पर्वो पर भारी भीड़ आती है। विभिन्न तरह की परम्पराएं और धार्मिक विधि विधान इसी नदी के किनारे पर ही सम्पन्न होते है।

अब है बेहद दयनीय दशा

हजारों सालों से अपने अंदर धर्म,आस्था और इतिहास समेटे सई की आज बेहद दयनीय स्थिति है। कहीं-कहीं तो यह नाले में तब्दील हो गई है। फ़िरोजगान्धी कॉलेज के प्राणी विज्ञान विभाग द्वारा तैयार एक रिपोर्ट से पता चलता है कि इसके जल में आक्सीजन की मात्रा बेहद कम है, लेड, क्रोमियम, निकेल, बेल्ट, कोबाल्ट की मात्रा जरूरत से ज्यादा है। साथ ही रोगकारक कीवाणुओं की संख्या बहुत है। मानक के अनुसार 50 स्तर से कम पर जल पीने योग्य माना जाता है,100 स्तर पर इसे अत्यधिक प्रदूषित माना जाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार रायबरेली में सई के जल का मानक 200 के ऊपर है। जो कि बेहद खतरनाक है। प्रसिद्ध समाजसेवी और नदियों पर शोध करनेवाले समाज शेखर कहते है कि इसके पीछे नगरपालिका और फैक्ट्रियों का अवशिष्ट है। शेखर के अनुसार नदियों का अपना स्वभाव होता है और इसे समझने के लिये हमें गांव स्तर पर काम करना पड़ेगा।

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