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आत्मनिर्भरता की मिसाल: दोनों पैर से दिव्यांग संतोष ने 30 परिवारों को दिए 'रोजी-रोटी'

आत्मनिर्भरता की मिसाल: दोनों पैर से दिव्यांग संतोष ने 30 परिवारों को दिए रोजी-रोटी
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वाराणसी । एएनएन (Action News Network)

कोरोना संकट काल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान को वाराणसी के दिव्यांग संतोष कुमार ने अपने संकल्प एवं मजबूत इच्छाशक्ति से साकार किया है।

30 दिव्यांगजनों को भी अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद की

लॉकडाउन में शारीरिक और आर्थिक संकट के बावजूद संतोष न सिर्फ अपने पैरों पर हूनर के दम पर खड़े रहे, बल्कि 30 दिव्यांगजनों को भी अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद की। सन्तोष कुमार ने गरीबी और शारीरिक कमी को आगे बढ़ने की राह में आड़े नहीं आने दिया। आज कठिन संघर्ष और परिश्रम से अपना और साथियों को घर चलाने में सहयोग कर रहे हैं।

वाराणसी के आयर बाजार के निकट रहने वाले संतोष कुमार ने मंगलवार को अपने सफ़र और संघर्ष को साझा किया। उन्होंने बताया कि महज 5 वर्ष की उम्र में पोलियो के कारण दोनों पैर बेकार हो गए। पैर से वह किसी तरह घसीट के चलते थे।

एक बारगी जीवन में आये इस संकट से निराशा हुई लेकिन उन्होंने बेरंग और कठिन जिंदगी से हार नहीं मानी। शारीरिक कमी से जूझते हुए कुछ कर गुजरने का सपना पाले किसी तरह जीवन के सफर में आगे बढ़ते रहे।

इसमें घर वालों ने भी साथ दिया। समय के अंतराल में उन्हें चलने के लिए बैसाखी मिली। फिर इसी बैसाखी का सहारा लेकर वह चलने लगे। अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर जीवन की चुनौती को संतोष ने अवसर में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया।

हमेशा कुछ अलग करने और अपनी शारीरिक कमी को दरकिनार कर अलग पहचान बनाने के लिए आतुर संतोष कुमार ने शिक्षण संस्थान किरण समाकलन दिव्यांग संस्थान की स्थापना की। जो समय काल में उनके ​नेतृत्व कौशल और सहयोगी स्वभाव से अब बहुत बड़ा रूप ले चुका है।

सन्तोष बताते हैं शुरू में शिक्षण संस्थान में पढ़ने के बाद बच्चे कहां जाएं, कौन सा रोजगार करें, इसको लेकर गहन मंथन किया। तब मन में एक विचार आया कि क्यों ना हम इन्हें स्वालंबन की ओर ले जायें और इनको स्वरोजगार उपलब्ध करायें। फिर इसी योजना के तहत संतोष ने बेकरी बनाने का एक कारखाना खोला।

बताते हैं कि कारखाना खोलने और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए रिश्तेदारों से कर्ज भी लिया। 05—06 लाख रूपये उन्हें इस कारखाने को खोलने में लग गया। फिर लंबे संघर्ष के बाद कारखाना चलने लगा। कारखाने में उन्होंने 15 दिव्यांग साथियों को काम पर लगाया। साथी बेकरी का काम, पावरोटी, क्रीम रोल, पेस्टी बनाते हैं।

उन्होंने बताया कि लगभग 15 दिव्यांग साथी यहां से बने उत्पाद को बाजार में ले जाकर बेचते हैं। और नया आर्डर भी लेते है। संतोष बताते हैं कि माल की गुणवत्ता को देखते हुए उन्हें इतना आर्डर मिल जाता है कि समय पर इसे पूरा करना कठिन हो जाता है। उन्होंने बताया कि कारखाने से 30 परिवार का रोजी रोटी चल रही हैं। लॉकडाउन के बाद स्थिति सामान्य होने पर इसे और विस्तार देने की योजना है।

संतोष ने बताया कि यहां कार्य करने वाले साथी 300 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी पा जाते हैं। मैं दिव्यांग होने पर अपने भाग्य को लेकर कभी दुखी नहीं हुआ और न ही गरीबी के दिनों में समाज और सरकार के आगे हाथ फैलाया।

नहीं है पैर, फिर भी फर्राटे से चलाते हैं 'कार'

दिव्यांग संतोष कुमार दोनों पैर काम नहीं करने पर भी अपनी मारुति 800 कार स्वयं चलाते हैं। उन्होंने बताया कि अपनी कार को उन्होंने मॉडिफाई करके उसका ब्रेक गियर क्लच सब हाथ में कर लिया। इसके बाद अभ्यास से अब फर्राटे से बनारस की सड़कों पर कार से चलते हैं। कहते हैं कि अगर मनुष्य में आत्मबल हो तो कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है।

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