Top
Action India

शिक्षक दिवस : शिक्षक दंपति ने प्लेटफार्म के कल्लर को भी सिखा दिया गुड मॉर्निंग

शिक्षक दिवस : शिक्षक दंपति ने प्लेटफार्म के कल्लर को भी सिखा दिया गुड मॉर्निंग
X

बेगूसराय । Action India News

'गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय' प्रत्येक पांच सितम्बर को मनाए जाने वाले शिक्षक दिवस के दिन लोग और सरकारों को यह पंक्ति जरूर याद आती है।

लेकिन सरकार और विभाग के तमाम कोशिश के बाद भी लाखों बच्चे शिक्षा एवं बाल अधिकार से महरूम, नशे एवं बालश्रम से जुड़ अपने जीवन और बचपन को खो रहे है। देश के अन्य रेलवे जंक्शन की तरह बरौनी जंक्शन के आसपास दर्जनों ऐसे बच्चे हैं जिनका बचपन गुमराह हो चुका है।

इनके जीवन में ज्ञान की रोशनी जलाने के लिए 2013 से एक शिक्षक दंपति लगातार कोशिश कर रहे हैं। इन्होंने प्लेटफार्म के कल्लर कहे जाने वाले बच्चों को ना केवल जोड़-घटाव सिखा दिया है, बल्कि यह बच्चे गुड मॉर्निंग भी बोलने लगे हैं।

यह शिक्षक दंपति हैं बेगूसराय के शोकहरा निवासी अजीत कुमार एवं शबनम मधुकर। जो सात वर्षों से बरौनी एवं विभिन्न रेलवे प्लेटफार्म पर मुफलिसी की जिंदगी गुजार रहे अनाथ, बेसहरा, नशे के आदि दर्जनों बच्चों के बीच ज्ञान की असीम रोशनी पहुंचाने, उसे नशे की दुनिया से दूर करने में लगे हुए हैं।

उत्तर बिहार के प्रमुख रेलवे स्टेशन बरौनी आने-जाने वाले शायद ही किसी ने गौर किया होगा कि यहां दर्जनों अनाथ और बेसहरा बच्चे शिक्षा एवं समाज से बिल्कुल अलग, भूख, कुपोषण, अशिक्षा एवं नशे के गिरफ्त में आकर जानवरों से भी बदत्तर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। यहां सरकार और संबंधित विभाग की हर कोशिश बौनी साबित हो रही है, ऐसे बच्चों के लिए बनाए गए बाल कल्याण योजनाएं धरातल पर नहीं उतर पा रही है।

ये अलग बात है कि सरकार और विभाग आंकड़ों का जादू दिखा खुद अपने ही हाथोंं अपना पीठ थपथपाये जा रही है। अजीत एवं शबनम ने कई स्थानीय विद्यालयों के अलावा संबंधित सभी आला अधिकारियों सहित प्रधानमंत्री कार्यालय एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक का दरवाजा खटखटाया।

इन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन अजीत और शबनम ने हार नहीं मानी और स्वयं ही ऐसे बच्चों को शिक्षित और नशामुक्त कर समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का निश्चय किया। फरवरी 2013 में बरौनी जंक्शन के खाली पड़े शेड (टी.पी.टी) में अनाथ बेसहारा बच्चों का अनोखा विद्यालय शुरू किया।

जहां कि प्लेटफार्म एवं स्टेशन के आसपास झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चे सामान्य स्कूलों की तरह रोज पढ़ाई से पहले प्रार्थना तथा योगा करते हैं। शिक्षक दंपति ना सिर्फ उन बच्चों को प्लेटफार्म पर शिक्षा दान करते हैं, बल्कि उसे अपने घर का बना भोजन एवं अन्य जरूरतों का ख्याल भी रखते हैं।

शबनम कहती हैं कि हमारा यह शैक्षणिक एवं नशामुक्ति अभियान ना सिर्फ बरौनी जंक्शन के इन 40 बच्चों के लिए है। बल्कि देश के उन तमाम बच्चों के लिए है जो अपना जीवन और बचपन खो रहे हैं। अजीत ने बताया कि उसका बचपन अपने पिता सीताराम पोद्दार के साथ बरौनी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते हुए गुजरा।

इरादे के मजबूत और धुन के पक्के अजीत शुरू से पढ़-लिखकर शिक्षक बनना चाहते थे। स्नातक की पढ़ाई पूरी कर 2004 में उत्क्रमित मध्य विद्यालय रेलवे बरौनी में भाषा एवं गणित शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए।

अपने संघर्ष के दिनों में इन्होंने रेलवे प्लेटफार्म पर मुफलिसी की जिन्दगी गुजार रहे सैकड़ों अनाथ, बेसहारा, आश्रयहीन बाल श्रमिक बच्चों की जिंदगी को काफी करीब से देखा। उनके दर्द को महसूस किया जो पढ़ने-लिखने और खेलने की उम्र में अपना जीवन और बचपन खो देते हैं।

Next Story
Share it