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मजदूर बोले,कोरोना से मौत आए न आए भूख से मर जाएंगे

मजदूर बोले,कोरोना से मौत आए न आए भूख से मर जाएंगे
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  • जो कल तक गांव के लिए भाग रहे थे,वापस शहरों में काम के लिए जाते मिले

झांसी । एएनएन (Action News Network)

विश्वव्यापी कोरोना के कहर से पूरा देश लड़ रहा है। तो दूसरी ओर देश में मजदूरों की भी अपनी समस्या है। 10 दिन पहले तक जिन मजदूरों को देश के विभिन्न राज्यों से लाॅकडाउन के नियमों को तोड़ते हुए अपने गांव पहुंचने की चिंता सता रही थी। उन्हें अपने गांव पहुंचने के अलावा सरकारों से कुछ नहीं चाहिए था। वही, मजदूर बीते रोज झांसी के रेलवे स्टेशन पर मजदूरी के लिए वापस अपने उसी स्थान पर जाने के लिए व्याकुल मिले। पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ये पापी पेट का सवाल है साहब। पेट की आग बहुत ही बुरी चीज है। कोरोना के कहर से तो हम कुछ हद तक बच भी जाएंगे कोरोना से मौत आए न आए लेकिन ये पेट की आग हमें जीते जी मार डालेगी।

विश्व के अधिकांश देशों में दहशत फैलाने वाले कोरोना से निपटने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कफ्र्यू लगाते हुए एक दिन का बंद किया था। उसके तुरंत बाद ही 24 मार्च को रात आठ बजे प्रधानमंत्री ने देश में 21 दिन के लाॅकडाउन की घोषणा कर दी थी। इसके बाद से ही देश के विभिन्न राज्यों के महानगरों में रोजगार की तलाश में पहुंचकर अस्थाई रुप से जमे हुए मजदूरों ने वहां से निकलने में अपनी भलाई समझी और लाॅकडाउन के कठोर नियमों के बीच मजदूर बेतरतीब तरीके से भाग खड़े हुए। आलम यह रहा कि करीब डेढ़ माह तक प्रशासन के हाथ पांव फूले रहे। झांसी के लिए यह और भी अहम और नाजुक मामला था। वजह थी कि अधिकांश राज्यों के बाॅर्डर मप्र होते हुए झांसी में ही खुलते हैं। इसके चलते यहां यूपी समेत देश तमाम राज्यों से आने और जाने वाले मजदूरों का जमावड़ा बना रहा। प्रतिदिन यहां 20 हजार से अधिक मजदूर आते जाते रहे हैं। इसके चलते लाॅकडाउन के नियमों का कतई पालन नहीं हुआ। आज आलम सामने है। ढाई महीने तक लाॅकडाउन रखने के बाद भी देश में मरीजों की संख्या ढाई लाख के करीब है।

झांसी के रेलवे स्टेशन पर रोज शाम को यही तस्वीर होती है। चारों ओर मजदूरों का जमावड़ा होता है। बीते रोज ऐसे ही तमाम मजदूर अपने गांवों से वापस रोजगार के लिए निकलने के लिए टेªन की राह देखते मिले। यहां लोग हर हालत में अब काम पर वापस लौटना चाह रहे हैं। किसी को इसलिए वापस उसी नगर में काम पर जाना है क्योंकि उनके क्षेत्र में उपयुक्त मजदूरी नहीं मिलती तो कोई बताता मिला कि उनके क्षेत्र में काम है ही नहीं। दो महीने बैठकर खा लिया अब वापस कमाने के लिए जाना चाहते हैं।

गौरतलब है कि, झांसी की सीमाओं के आसपास 10 दिन पहले तक मजदूरों की भीड़ थी। सभी अपने घर जाना चाहते थे। जैसे ही जून से अनलॉक शुरू हुआ। इन प्रवासी मजदूरों को पेट की आग सताने लगी है। अपने घर से बोरी व थैलों में सामान भरकर इनको अब काम की चिंता सता रही है। कोई हैदराबाद जा रहा है तो कोई फरीदाबाद और कोई सूरत,भोपाल की ओर रवाना होना चाहता है। सभी का एक ही कहना है कि पेट की भूख के आगे कोरोना का खौफ भी अब कमजोर लगने लगा है। फिलहाल यह तब हो रहा है जब कोरोना का कहर दिन प्रतिदिन अपने पांव पसारने में लगा है। आज देश में प्रतिदिन करीब 10 हजार से अधिक मरीज सामने आ रहे हैं। अब तो सबसे से सुरक्षित कहा जा रहा उप्र भी कोरोना मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होते देख रहा है। आज इन लोगों ने यह साबित भी कर दिया है कि भूख से बड़ा न कोई डर है और न ही कोई मजहब इससे बड़ा स्थान रखता है।

बोले मजदूर,नहीं मिलती मन माफिक मजदूरी
एक्शन इंडिया समाचार से बात करते हुए लखनऊ निवासी संतोष श्रीवास्तव ने बताया कि वह और उनके साथ हैदराबाद में साड़ियों पर जरी का काम करते हैं। उन्हें वहां इसके लिए हजार से 12 सौ रुपये तक मिल जाता है। जबकि लखनऊ में इसी काम के लिए उन्हें महज 300 रुपये ही दिए जाते हैं। अब ऐसे में वह और उनके साथी लखनऊ में काम करना पसन्द क्यों करेंगे। पिछले 6 वर्षों से वह हैदराबाद में ही काम कर रहे हैं। हालांकि वह इस बात पर चुप्पी साध गए कि आखिर हैदराबाद से वे लाॅकडाउन में वापस क्यों भागे। इंतजार कर लेते।

बुन्देलखण्ड के मजदूर भी जाते मिले वापस
बुन्देलखण्ड के महोबा जनपद स्थित तहसील कुलपहाड़ के गांव सुगरा में रहने वाला छत्रपाल अपने छोटी बेटी के साथ दिल्ली के समीप फरीदाबाद जाने के लिए स्टेशन पर बैठा था। उसका कहना था कि उसके क्षेत्र में मजदूरी नहीं मिलती। खाने को नहीं बचा है। अब ऐसे में दो महीने से बैठे बैठे वह क्या करता। उसने बताया कि उसे जानकारी मिली है कि कुछ काम खुल गया है। मजदूरी मिल जाएगी। वहां से सेठ ने भी बुलाया है। तो जा रहे हैं। हालांकि वह शासन द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं के बारे में बताने से कतराता नजर आया।

अन्य जनपदों व क्षेत्रों के लोग भी जा रहे अपने कर्म क्षेत्र में
कुछ ऐसा ही हाल उन्नाव के निवासी गोविंद, राहुल व संदीप का था। जबकि बलरामपुर निवासी नूर मोहम्मद व बस्ती निवासी मोहम्मद सादिक ने बताया कि वे हैदराबाद में सौफे का काम करते हैं। लाॅकडाउन में कोरोना की दहशत में वे अपने घर वापस लौट आए थे। अब सेठ का बुलावा आ गया है। लाॅकडाउन भी खुल रहा है। तो हम वापस जा रहे हैं।

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