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डॉ. केदारनाथ सिंह की जयंती पर पैतृक गांव में लगा साहित्यकारों का जमावड़ा

डॉ. केदारनाथ सिंह की जयंती पर पैतृक गांव में लगा साहित्यकारों का जमावड़ा
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Highlights :-

  • वक्ताओं ने कहा- डॉ. केदारनाथ सिंह की कविताओं में थी प्रकृति संरक्षण की सोच
  • प्रकृति संरक्षण व वर्तमान की ज्वलन्त समस्याओं पर हुई गोष्ठी में चर्चा

बलिया। एएनएन (Action News Network)

साहित्य जगत के प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार डॉ. केदारनाथ सिंह की जयंती पर मंगलवार को उनके पैतृक गांव चकिया (बैरिया) में साहित्यकारों का जमावड़ा हुआ। इस अवसर पर प्रो. यशवंत सिंह की अध्यक्षता में एक गोष्ठी का भी आयोजन हुआ जिसमें साहित्यकारों और कवियों ने केदार जी की रचनाएं सुनाकर उनको याद किया। वक्ताओं ने कहा कि उनकी कविताओं में प्रकृति संरक्षण की सोच थी।

साहित्यकारों ने केदारनाथ सिंह के जीवन से जुड़े किस्सों को उपस्थित लोगों से साझा किया। इस अवसर पर 'साखी' पत्रिका के सम्पादक सदानन्द शाही ने भोजपुरी में अपना सम्बोधन देकर केदारनाथ सिंह की बातों को उनके ही शब्दों में साझा किया। उल्लेखनीय है कि इस पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. केदारनाथ ही थे। प्रोफेसर शाही ने कहा कि केदारनाथ सिंह समग्रता के कवि थे। यानि जीवन को सिर्फ मनुष्यों तक केंद्रित नहीं करते हुए प्रकृति संरक्षण की भी सोच रखते थे। उन्होंने कहा कि शब्द, सरस्वती व मनुष्यों की साधना में लगे रहने वालों के लिए केदार जी एक वरदान थे। उनकी मिट्टी पर आने पर खुद को सौभाग्यशाली महसूस कर रहा हूं।

भागड़ दादा उठ, हो गइल बिहान
गोष्ठी में बीएचयू के प्रो. सदानन्द शाही ने भोजपुरी में केदारनाथ सिंह की कुछ रचनाओं को सुनाकर उनकी यादें ताजा कर दी। उन्होंने कहा कि केदार जी नदी', कुंआ, तालाब, खेत-खलिहान आदि पर कविताएं लिखते रहे। भोजपुरी में 'भागड़ नाला जागरण मंच' नामक कविता से केदार जी की कुछ पंक्तियां उध्दृत करते हुए सुनाया 'भागड़ दादा उठ, हो गइल बिहान। पशु-पक्षी, गाय, बैल, किसान भागड़ में तोहार पानी पीके प्यास बुझावे पहुंचल बा लो।'

प्रो. शाही ने कहा कि उनकी रचनाओं में यह चिंतन था कि वह कौन सी वजह है कि कुंआ, नदी व तालाब से पानी निकलकर बोतल में आ गया। आदमी, चिड़िया, जानवर, चुरूँगा, नदी-नाला सबको जोड़कर दुनिया बनी लेकिन देश से पानी ही चला गया। अब देश के पानी को जगाने की जरूरत है। ऐसी ही कई प्रकृति से जुड़ी समस्याओं पर आधारित और लोगों को जगाने के लिए उनकी रचनाएं होती थी। प्रो. शाही ने साखी पत्रिका के कुछ अंश को भी पढ़कर सुनाया।

गोष्ठी में जिलाधिकारी श्रीहरि प्रताप शाही ने कहा कि यह मेरा सौभाग्य रहा कि केदार जी का आशीर्वाद हमेशा मिलता रहा। मेरी पोस्टिंग जहां भी रही, कभी ना कभी उनसे मुलाकात होती रही। सजहता, सरलता में उनकी विद्वता भी झलकती थी। सबसे खास बात है कि उनकी हर रचना में गांव, गांव के लोग, गवई माहौल जैसी मूल बातें झलकती थी। उनकी जयंती पर उनके गांव में मौजूदगी को अपना सौभाग्य समझता हूं। उन्होंने अपील की कि यह आयोजन हर वर्ष होना चाहिए। कटिहा ना अमवा के सोर केदारनाथ सिंह की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में आए कवियों व साहित्यकारों ने केदार जी की रचनाओं के माध्यम से विशेष रूप से प्रकृति को बचाने का भी संदेश दिया।

बीएचयू में अध्ययनरत सुशांत ने प्रकृति का महत्वपूर्ण अंग पेड़ों की सुरक्षा पर आधारित केदारनाथ जी की 'लोहे के टंगुनिया से बगिया में बाबा, कटिहा ना अमवा के सोर' कविता सुनाकर सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। पेड़ों के संरक्षण के अलावा उन्होंने वर्तमान की ज्वलन्त पारिवारिक समस्याओं पर आधारित अपनी भी कुछ कविताएं पढ़ी। सुशांत की कविता 'देहिया ने दरार परे त परे, नेहिया में दरार ना फाटई रे' को भी सबने पसन्द किया।

वक्ताओं में कवि उदय प्रकाश, बीएचयू के प्रो. अवधेश, श्वेतांक, डॉ राजेश मल्ल आदि ने केदारनाथ सिंह के जीवन से जुड़े अपने विचार साझा किए। अंत में स्व. केदारनाथ के पुत्र सुनील सिंह (आईएएस) ने आगंतुकों के प्रति आभार जताया। संचालन प्रोफेसर कामेश्वर सिंह ने किया।

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