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हिमाचल में ट्रेड यूनियनों का सरकार के खिलाफ प्रदर्शन

शिमला । एएनएन (Action News Network)

ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के राष्ट्रीय आह्वान पर हिमाचल प्रदेश में सीटू, इंटक व एटक से जुड़े हजारों मजदूरों ने शुक्रवार को प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए। श्रमिक कानूनों में बदलाव तथा 8 घण्टे की डयूटी को 12 घण्टे करने के सरकार के निर्णय के खिलाफ ट्रेड यूनियनों ने शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन किए। इस दौरान विभिन्न जिला मुख्यालयों में उपायुक्तों के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी सौंपे गए।

हिमाचल प्रदेश संयुक्त मंच के राज्य संयोजक डॉ कश्मीर ठाकुर, इंटक प्रदेशाध्यक्ष बावा हरदीप सिंह, एटक प्रदेशाध्यक्ष जगदीश चंद्र भारद्वाज, सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा ने प्रदेश सरकार द्वारा फैक्टरी एक्ट,कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट,इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट में बदलाव करने व कार्यदिवस के समय को 12 घण्टे करने के निर्णय की निंदा की और इसे मजदूरों के अधिकारों पर कठोर प्रहार करने वाला कदम करार दिया। उन्होंने प्रदेश सरकार को चेताया है कि वह पूंजीपतियों व उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए मजदूर विरोधी नीतियां बनाना बन्द करे।

यूनियन के नेताओं ने कहा कि मजदूर कोरोना महामारी व लॉक डाउन के दौर में मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित व पीड़ित हैं। ऐसे समय में प्रदेश की भाजपा सरकार ने उनके जख्मों पर मरहम लगाने के बजाए श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी परिवर्तन करके उनके जख्मों पर नमक छिड़क दिया है। ये मजदूर विरोधी कदम पूरी तरह से मानवता विरोधी हैं। सीटू के राज्य अध्यक्ष विजेंद्र मेहरा ने कहा कि कार्यदिवस आठ के बजाए बारह घण्टे करने से फैक्ट्रियों में कार्यरत लगभग एक तिहाई मजदूरों की छंटनी होना तय है। अभी आठ घण्टे की डयूटी के कारण फैक्ट्रियों में तीन शिफ्ट का कार्य होता है।

बारह घण्टे की डयूटी से कार्य करने की शिफ्टों की संख्या तीन से घटकर दो रह जाएगी जिसके चलते तीसरी शिफ्ट में कार्य करने वाले एक-तिहाई मजदूरों की छंटनी हो जाएगी। इस निर्णय ने प्रदेश में हजारों मजदूरों की छंटनी के दरवाजे खोल दिए हैं। इसी तरह कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट में श्रम कानूनों को लागू करने के लिए किसी भी संस्थान में बीस ठेका मजदूरों की शर्त को बढ़ाकर ठेका कर्मियों की भारी संख्या को श्रम कानून के दायरे से बाहर कर दिया है। इसी तरह फैक्ट्री एक्ट के संशोधन से ऊर्जा संचालित कारखानों में श्रम कानूनों को लागू करने की दस मजदूरों की संख्या को बढ़ाकर बीस करने व बगैर ऊर्जा संचालित कारखानों में मजदूरों की संख्या को बीस से बढ़ाकर चालीस करने से मजदूरों की संख्या का एक बड़ा हिस्सा कारखाना अधिनियम के दायरे से बाहर हो जाएगा।

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