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बंद होटल, बिकीं टैक्सियां, भीख मांगते गाइडः कोविड ने कैसे तबाह किया दिल्ली, आगरा, जयपुर का पर्यटन

बंद होटल, बिकीं टैक्सियां, भीख मांगते गाइडः कोविड ने कैसे तबाह किया दिल्ली, आगरा, जयपुर का पर्यटन
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एक्शन इंडिया न्यूज़


नई दिल्ली, आगरा, जयपुर: जैसे ही भारतीय पर्यटकों का एक समूह मशहूर आगरा क़िले की टिकट खिड़की तक पहुंचा, 29 वर्षीय गाइड सलमान ख़ान की उम्मीद जगी कि उसे कुछ बिज़नेस मिलेगा.

तेज़ी के साथ सैलानियों की ओर बढ़ते हुए उसने उन्हें अपना पीला पड़ गया आईडी कार्ड दिखाया और उन्हें राज़ी करने की कोशिश करने लगा, कि उचित दाम की वजह से उसकी सेवाएं ले लें. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसने ऐसी ही तीन और कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उसे ठुकरा दिया गया.

उसने कहा, 'ज़िंदा रहने के लिए मुझे कभी मांगना नहीं पड़ा था. लेकिन अब यह नई चीज़ मेरे लिए सामान्य हो गई है. मेरे पास कोई चारा नहीं है.'

महामारी से पहले के दौर में, सलमान एक निजी फर्म के लिए काम करता था, जो रूसी सैलानियों के लिए उसकी सेवाएं लेती थी, चूंकि वो रूसी भाषा जानता है. वो पिछले पांच साल से इस व्यवसाय में है, लेकिन भारतीय पर्यटकों की ज़रूरत पूरी करना, उसकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा है.

सलमान ने बताया कि ऐसा इसलिए है, कि घरेलू सैलानी सिर्फ फोटो क्लिक करते हैं, और वो जिस जगह जाते हैं वहां के इतिहास, और उसके महत्व को समझने में उनकी दिलचस्पी नहीं होती. यही वजह है कि विदेशी सैलानियों की कमी का इतना ज़्यादा असर पड़ा है.


क़रीब पांच घंटे की दूरी पर, आमेर महल में एक टूरिस्ट गाइड मोहम्मद एहसान ने भी ऐसी ही कहानी सुनाई. लेकिन सलमान के उलट, उसके पास लुभाने की कोशिश करने के लिए, घरेलू पर्यटक भी नहीं थे.

पास ही में एक ख़ाली टूरिस्ट लॉबी की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, 'अगर मुझे दिन भर में एक ग्राहक भी मिल जाए, तो मैं अपने परिवार का कुछ ख़र्च उठा सकता हूं, लेकिन देखिए ज़रा कितने सैलानी इस जगह पर आ रहे हैं'.

नरेंद्र मोदी सरकार ने चार्टर्ड फ्लाइट्स के ज़रिए,अंतर्राष्ट्रीय सैलानियों को 15 अक्तूबर से भारत आने की अनुमति दे दी है, जबकि नियमित रूट्स से आने वाले सैलानी 15 नवंबर से आ सकेंगे.

लेकिन, मार्च 2020 के बाद से, जब कोविड-19 महामारी ने देश को अपनी चपेट में लिया, भारत में विदेशी सैलानियों का आना नहीं हुआ है.

महामारी और लॉकडाउंस का नतीजा ये रहा है कि घरेलू पर्यटकों की संख्या भी महामारी-पूर्व के स्तर को नहीं पहुंची है.

अब, जब देश खुलने लगा है तो दूसरे क्षेत्र पटरी पर वापस आते दिख रहे हैं, लेकिन पर्यटन उद्योग के सामने अभी भी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं- अर्थव्यवस्था में सुस्ती है और महंगाई के साथ मिलकर, ये जेबों पर बेहद भारी पड़ रही है, जिससे यात्राओं को एक विलासिता के तौर पर देखा जा रहा है.

नतीजे में इस क्षेत्र के आंकड़े, जिस पर महामारी में सबसे बुरी मार पड़ी थी, एक धूमिल तस्वीर पेश करते हैं, जिसकी समस्याएं पर्यटन कारोबार के सभी पहलुओं में, नीचे तक आ गई हैं.

होटल बंद हो गए हैं और जो खुले हैं उन्हें स्टाफ कम करना पड़ा है; गोल्डन ट्रायंगल ज़ोन (दिल्ली-आगरा-जयपुर) में चल रहे टैक्सी ड्राइवरों को अपनी गाड़ियों को बेंचना पड़ा है, चूंकि बिना किसी आमदनी के गाड़ियों की क़िस्तें भरना अव्यावहारिक हो गया है; कुछ टूरिस्ट गाइड्स अब घरेलू वर्कर्स या ई-रिक्शा ड्राइवर्स का काम कर रहे हैं; जबकि यादगार वस्तुओं की दुकानें चलाने वाले दिन भर अपनी दुकानों के बाहर ख़ाली बैठे रहने को मजबूर हैं.

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