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भूमि शोधन एवं रोगों से बचाव कर धान की फसल पर आय बढ़ायें किसान : डा. उमाकांत त्रिपाठी

भूमि शोधन एवं रोगों से बचाव कर धान की फसल पर आय बढ़ायें किसान : डा. उमाकांत त्रिपाठी
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नर्सरी डालने से पहले धान के बीज पर स्ट्रैप्टोसाइक्लिन डालकर रात भर पानी से भिगोएं

कानपुर। एक्शन इंडिया न्यूज़

खरीफ की फसलों में धान की फसल उत्तर प्रदेश में अहम मानी जाती है और हर वर्ष उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन कई कारणों से किसान को जो लाभ मिलना चाहिये वह नहीं मिल पाता। इसके लिए किसान को सतर्कता बरतना बहुत जरुरी है, जिसमें रोगों से बचाव करना सबसे महत्वपूर्ण है।

इसके साथ ही बीज उपचार और भूमि शोधन भी जरुरी है। इन सभी पर कार्य करके किसान धान की फसल पर अपनी आय आसानी से बढ़ा सकता है। यह बातें गुरुवार को सीएसए के पादप रोग विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डा. उमाकांत त्रिपाठी ने कही।

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय (सीएसए) के पादप रोग विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डा. उमाकांत त्रिपाठी ने किसान भाइयों को धान की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए पादप रोगों से बचाव के लिए समसामयिक सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा कि यदि धान की खेती में समय रहते ध्यान न दिया जाए तो आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है।

उन्होंने बताया कि मुख्तय: किसान भाई धान की नर्सरी डालकर रोपाई करते हैं या फिर कुछ किसान भाई सीधी धान की बुवाई भी करते हैं। इन दोनों तरह की खेती में बीज उपचार, भूमि शोधन एवं धान की खड़ी फसल में दवाइयों का छिड़काव बहुत आवश्यक है, जिससे लगभग 15 से 20 फीसद आय बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि धान में प्रमुख रोग सफेद रोग (नर्सरी में), जीवाणु झुलसा, भूरा धब्बा एवं खैरा रोग प्रमुखता से लगते हैं। बताया कि धान की फसल में जड़ एवं तना गलन की समस्या के रोकथाम के लिए ट्राइकोडरमा विरिडी नामक जैविक फफूंदी नाशक लाभप्रद पाया गया है। ट्राइकोडरमा विरिडी से बीजों में अंकुरण अच्छा होकर फसलें फफूंद जनित रोगों से मुक्त रहती हैं।

रोगों से ऐसे करें बचाव

डा. उमाकांत त्रिपाठी ने बताया कि धान की नर्सरी डालने की पूर्व धान को जीवाणु झुलसा रोग से बचाव के लिए चार ग्राम स्ट्रैप्टोसाइक्लिन प्रति 25 किलोग्राम बीज को पानी में रात भर रखें तथा सुबह छाया में सुखाकर खेत में नर्सरी डाल दें। खैरा रोग की रोकथाम के लिए धान की नर्सरी में बुवाई से 10 से 14 दिन बाद 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट एवं 20 किलोग्राम यूरिया 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

उन्होंने धान की फसल को सफेद रोग से बचाव के लिए चार किलोग्राम फेरस सल्फेट का छिड़काव करने के लिए कहा तथा अन्य रोगों के लिए दो किलोग्राम जिंक मैग्नीज कार्बामेट व प्रॉपिकोनाजोल 500 ग्राम को 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए। तथा धान की पौध रोपाई के समय 5 ग्राम ट्राइकोडरमा विरिडी जैविक फफूंदी नाशक को प्रति लीटर पानी में घोलकर उसमें पौधों को डुबोकर रोपाई करने के लिए बताया।

यह भी कहा कि बुवाई /रोपाई के पूर्व 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडरमा विरिडी तथा 60 किलोग्राम गोबर की खाद में हल्की नमी के साथ तीन से पांच दिन तक छाया में रखकर प्रति हेक्टेयर खेत में मिलाना चाहिए। किसान भाइयों को बताया कि धान की फसल में रोगों के लक्षण दिखाई देने पर रसायनों/ जैविक फफूंदी नासकों का तुरंत छिड़काव करें। इसके साथ ही यदि रोग पूर्णतया समाप्त न हो तो सात से 10 दिन के अंतराल पर पुन: छिड़काव करें।


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