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कोरोना काल में हाईकोर्ट के सरकारी वकीलों की फीस में कटौती

कोरोना काल में हाईकोर्ट के सरकारी वकीलों की फीस में कटौती
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प्रयागराज। एक्शन इंडिया न्यूज़

इलाहाबाद हाईकोर्ट में कार्यरत उत्तर प्रदेश सरकार के सरकारी वकीलों की फीस में सरकार ने कोरोना काल के दौरान कटौती कर दी है। राज्य विधि अधिकारियों के लिए कुछ हद तक राहत भरी खबर है कि उन्हें कटौती के साथ ही सही, पर फीस का भुगतान हो जाएगा।

उनकी फीस में कोरोना काल वाली कटौती तो होगी लेकिन वह मुकदमे में बहस करें या न करें, फीस सभी को मिलेगी। यानी सामान्य दिनों में दो फाइलों में बहस पर पूरी और एक में बहस पर आधी फीस की शर्त कोरोना काल के लिए स्थगित कर दी गई है। वर्चुअल सुनवाई में सरकार की पैरवी करने वालों और न करने वालों को कोरोना काल में कटौती के साथ फीस मिलेगी। जैसे ही अदालतें पूरी तरह से काम करने लगेंगी, कोरोना काल का यह नियम स्वतः खत्म हो जाएगा और वर्ष 1999 की फीस व्यवस्था बहाल हो जाएगी।

गुरुवार को प्रमुख सचिव विधि एवं न्याय पीके श्रीवास्तव ने यह आदेश कोरोना संक्रमण के कारण जारी किया है। यह आदेश फिलहाल वर्चुअल व खुली अदालत में सुनवाई दोनों स्थिति में लागू रहेगा। कोरोना काल मे बहस करने वालों व बहस न करने वालों में भेदभाव नहीं रखा गया है। हालांकि कार्यदिवस में कटौती अब भी जारी है। फौजदारी मामलों के राज्य विधि अधिकारियों को 80 फीसदी और सिविल मामलों के राज्य विधि अधिकारियों को 70 फीसदी फीस का भुगतान किया जाएगा।

इनकी फीस में क्रमशः 20 फीसदी व 30 फीसदी की प्रतिमाह कोरोना कटौती जारी रहेगी। शासकीय अधिवक्ता, अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम व द्वितीय, मुख्य स्थायी अधिवक्ता, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता, स्थायी अधिवक्ता व ब्रीफ होल्डर्स पर यह नियम लागू होगा।

गौरतलब है कि सामान्य तौर पर दो मुकदमों (फाइलों) में बहस पर पूरी फीस व एक केस पर आधी फीस दिए जाने का नियम है। सरकारी वकीलों की फीस के कुल बजट का आधा हिस्सा पाने वाले सरकार के पक्ष से बहस करने वाले इस कटौती से मुक्त रखे गए हैं। यानी महाधिवक्ता व अपर महाधिवक्ताओं की फीस में कोई कटौती नहीं होगी। फीस में कटौती से राज्य विधि अधिकारियों में निराशा है, क्योंकि राज्य सरकार ने कोरोना काल में सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के वेतन में कोई कटौती नहीं की है। बल्कि उन्हें विशेष भत्ता दिया जा रहा है।

सरकारी वकील अपनी आवाज उठाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। दबी जुबान से कहते हैं कि सरकारी वकील कोरोना का जोखिम उठाकर न्यायालय में सरकार का बचाव कर रहे हैं और गाज भी उन्हीं पर गिरी है। दूसरी तरफ ऐसी कटौती जिला न्यायालयों में लागू नहीं है।


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