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पिथौरागढ़ में बीआरओ ने 3 सप्ताह में बनाया 180 फीट लम्बा बेली ब्रिज

पिथौरागढ़ में बीआरओ ने 3 सप्ताह में बनाया 180 फीट लम्बा बेली ब्रिज
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  • इलाके के 20 गांवों के लगभग 15 हजार लोगों को होगा सीधा फायदा
  • आपदा प्रभावित इलाके में चलाए जा रहे राहत कार्यों में मिलेगा इसका लाभ

देहरादून । Action India News

पिथौरागढ़ जिले के आपदा प्रभावित इलाके में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने तीन सप्ताह के भीतर बेली ब्रिज का निर्माण कर मिसाल पेश की है। 180 फीट लम्बा यह बेली ब्रिज इस इलाके के 20 गांवों को कनेक्टीविटी प्रदान करता है।

पिथौरागढ़ जिले की धारचूला, बंगापानी और मुनस्यारी तहसीलों में पिछले महीने बादल फटने की घटनाएं हुई थीं, जिनमें 15 से अधिक लोगों की मलबे में दबकर मौत हो गई थी। बड़ी संख्या में मवेशियों और सम्पत्ति का भी नुकसान हुआ था। नदी-नालों के उफनने से बिजली, पानी और दूरसंचार लाइनें ध्वस्त हो गई थीं।

कई स्थानों पर सड़कें और पुल आदि भी बारिश में बह गए थे। उस दौरान जौलजीबी सेक्टर में बना 50 मीटर का स्पैन कंक्रीट पुल भी तेज बारिश में बह गया था। आपदा प्रभावित इलाकों में पिछले तीन सप्ताह से निरंतर रेस्क्यू और रेस्टोरेशन वर्क जारी है। सम्बन्धित एजेंसियां जन जीवन और अन्य सुविधाएं बहाल करने में जुटी हुई हैं।

पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी डॉ. वीके जोगदंडे ने जौलजीबी सेक्टर में महत्वपूर्ण पुल के बहने के बाद बीआरओ के अधिकारियों से आवाजाही के लिए यथाशीघ्र प्राथमिकता के आधार पर वैकल्पिक पुल बनाने को कहा था। बीआरओ ने पुल के निर्माण के लिए अपने संसाधनों और सेटअप को जुटाया।

हालांकि लगातार भूस्खलन और भारी बारिश के बीच पिथौरागढ़ से कुछ हिस्सों में परिवहन करना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद यह पुल रविवार को सफलतापूर्वक पूरा हो गया। अब इसके जरिये बाढ़ प्रभावित गांवों तक पहुंच बन गई है और जौलजीबी को मुनस्यारी से जोड़ा गया है। बीआरओ ने लगातार भूस्खलन और भारी बारिश के बावजूद तीन हफ्तों से भी कम समय में 180 फीट के इस बेली ब्रिज का निर्माण किया है।

इस कनेक्टिविटी से 20 गांवों के लगभग 15 हजार लोगों को राहत मिलेगी। इस पुल के बन जाने से जौलजीबी से मुनस्यारी तक 66 किलोमीटर सड़क परिवहन फिर से बहाल हो गया है। स्थानीय सांसद अजय टम्टा ने जौलजीबी से 25 किलोमीटर की दूरी पर लुमटी और मोरी के सबसे अधिक प्रभावित अलग-अलग गांवों के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की थी, जहां आपदा में अधिकतम मौतें हुई थीं। फिलहाल यह पुल आपदा प्रभावित गांवों के पुनर्वास में आवश्यक सहायता प्रदान करेगा।

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