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वरिष्ठ नागरिकों की समाज में दशा-दिशा और उपयोगिता पर हुई गोष्ठी

वरिष्ठ नागरिकों की समाज में दशा-दिशा और उपयोगिता पर हुई गोष्ठी
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  • बुजुर्गों की उपेक्षा के लिए कुछ हद तक वर्तमान शिक्षा और संस्कार को जिम्मेदार
  • बुजुर्गों को परेशानियों से बचने के लिए बच्चों के सहयोग की आवश्यकता


ऋषिकेश। एक्शन इंडिया न्यूज़


ऋषिकेश तीर्थ नगरी में वरिष्ठ नागरिकों की समाज में दशा- दिशा और उपयोगिता पर आयोजित गोष्ठी में बुजुर्गों की उपेक्षा के लिए कुछ हद तक वर्तमान शिक्षा-संस्कार को जिम्मेदार बताया गया।

गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि बुजुर्गों की उपेक्षा के लिए कुछ हद तक वर्तमान शिक्षा और संस्कार भी जिम्मेदार हैं। वरिष्ठ नागरिकों को 60 वर्ष की उम्र पार करने के बाद वर्तमान में उनके बच्चों के द्वारा की जा रही उपेक्षा से होने वाली परेशानियों से बचाने के लिए सबके सहयोग की आवश्यकता है। यह सहयोग तभी मिल सकता है ,जब हम उन्हें सनातन संस्कृति से जोडे़ं और संस्कारित करें। तभी वह अपने माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा कर सकते हैं।

सभी वक्ताओं का एकमत था कि जब तक हम अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा नहीं देंगे, तब तक बुजुर्गों की लगातार उपेक्षा होती रहेगी। इसका कारण है कि पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित शिक्षा में पारिवारिक संबंधों से जुड़ने के लिए किसी भी प्रकार का विचार नहीं किया गया है। यह विचार सिर्फ भारतीय शिक्षा में ही मिल सकता है, जिसका मूल कारण भारतीय शिक्षा में भारतीय मंत्रों का समावेश होना है। इस पर आज पूरे विश्व में शोध भी किए जा रहे हैं, जिसे देखते हुए पाश्चात्य संस्कृति के अनुरूप शिक्षा पद्धति को अधिकांश देशों में छोड़ना शुरू कर दिया है। जैसे इंडोनेशिया, श्रीलंका, बाली ,सुमात्रा, मॉरीशस इत्यादि जैसे देशों में भारतीय रामायण वेद पुराणों पर आधारित शिक्षा दी जा रही है।

इन देशों ने भारतीय शिक्षा का अध्ययन किया, जिसमें भगवान श्री राम, सीता माता, राम लक्ष्मण द्वारा मानव समाज को दी गई शिक्षा है। जिन्होंने अपने कर्तव्य को निभाने के लिए मर्यादा को बनाए रखा है। जबकि उसके विपरीत महाभारत काल में परिवारों के बीच वर्चस्व को लेकर आपसी वैमनस्य के प्रति भी जागृत किया गया है।

विचार गोष्ठी में वरिष्ठ नागरिकों को दिशा देते हुए बताया गया कि उनके द्वारा अपने सर्विस काल में जिस प्रकारों का अनुभव महसूस किया गया है, उसको अपने बच्चों के साथ साझा किया जाना चाहिए। वक्ताओं का यह भी कहना था कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है ,जब हम अपने परिवार में ही मित्रता का भाव उत्पन्न करेंगे। अपने बच्चों से किसी प्रकार की बात को नहीं छिपाएंगें। भारतीय परंपरा के अनुसार मनाए जाने वाले सभी पर्वों को परिवार के साथ मनाए जाने की अपील भी की गई ,जिससे उनमें अपने संस्कारों का बोध हो सकेगा। गोष्ठी में वैज्ञानिकता आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक विषय का भी बोध कराया गया। साथ ही रुकमणी माई धर्मशाला में 100 वर्ष पुराने मंदिर के प्रांगण में भक्तों की सुविधा को देखते हुए टीन के निर्माण के लिए ₹500000 की आर्थिक सहायता दिए जाने की घोषणा भी की गई।

भारतीय जनता पार्टी के अनुशासन समिति के अध्यक्ष देवेंद्र दत्त सकलानी की अध्यक्षता में आयोजित गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल उपस्थित रहे। इनके अलावा गोष्ठी में विशिष्ट अतिथि संजय शास्त्री ,मुख्य वक्ता अवकाश प्राप्त अधीक्षण अभियंता अनिल मित्तल, वक्ता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की संयोजक ब्रह्मकुमारी आरती बहन ने अपने विचार व्यक्त किए।

इसमें रुकमणी माई धर्मशाला के प्रबंधक अमरदीप जोशी, महासचिव श्याम नारायण कपूर, ब्रह्म प्रकाश शर्मा ,वेद प्रकाश ढिंगडा, गंभीर सिंह मेवाड़ ,मुकुल शर्मा ,वीरेंद्र शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा, नरेंद्र मैनी, मदन मोहन शर्मा सहित काफी संख्या में लोग उपस्थित थे।

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