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कांग्रेस की पहले दिखी थी टूट, फिर एकता

कांग्रेस की पहले दिखी थी टूट, फिर एकता
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  • उत्तराखंड के इतिहास में 18 मार्च, 2016 की खास अहमियत-हरीश सरकार को विनियोग बिल के दौरान लगा था झटका

देहरादून। एएनएन (Action News Network)

मध्य प्रदेश का सियासी संकट और वहां कांग्रेस की आपदा प्रबंधन में जुटे पार्टी के वरिष्ठ नेता हरीश रावत को देखकर उत्तराखंड की कई यादें ताजा हो रही हैं। समय भी लगभग वही है। 2016 में मार्च में ही उत्तराखंड के भीतर सत्ता संग्राम की अजब गजब तस्वीर ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। कोरोना के कहर के कारण भले ही इस बार 18 मार्च को सियासी तौर पर शांति रहेगी, लेकिन 2016 में इस दिन हरीश रावत सरकार के लड़खड़ाने और उसके बाद चले लंबे सियासी दांव पेंच की कहानी कभी न भूलने वाली है।

2016 को बजट सत्र के दौरान 18 मार्च को जब विनियोग बिल पारित कराया जा रहा था तो उसी समय पूर्व सीएम विजय बहुगुणा और मौजूदा कैबिनेट मंत्री डा हरक सिंह रावत की अगुवाई में कांग्रेस के नौ विधायकों ने सदन के भीतर ही सत्ता पक्ष में होने के बावजूद इसका विरोध कर दिया था। हालांकि तत्कालीन स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल विनियोग बिल पारित होने की बात कहते हुए तुरंत ही सदन से चले गए थे। इसके बाद, राज्यपाल केके पाॅल के यहां विधायकों की परेड और तमाम तरह के दांव पेंच सामने आए थे।

हरीश रावत सरकार बर्खास्त हुई थी, लेकिन स्टिंग प्रकरण की रोशनी के बीच बाद में सदन में उसका बहुमत साबित हो गया था।18 मार्च, 2016 का दिन जहां कांग्रेस की टूट के दर्शन कराने का दिन था, वहीं इसके बाद हरीश रावत और तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के तालमेल से पार्टी की एकता भी दिखी। अपने बाकी विधायकों को एकजुट रखने में कांग्रेस सफल रही। न सिर्फ सदन में विधायकों ने एकजुटता दिखाई, बल्कि सड़कों पर कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन कई मायनों में अभूतपूर्व था।

कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय इन दिनों सोशल मीडिया पर उन दिनों की यादों को ताजा कर रहे हैं। अपनी ताजा पोस्ट में किशोर उपाध्याय ने संगठन की मजबूती के लिए किए कार्यों का खास जिक्र किया है। उन्होंने कहा है कि प्रदेश में कांग्रेस की मोहल्ला और बाजार कमेटियों के गठन की अनूठी पहल की गई थी।

इसकी जानकारी जब राहुल गांधी को दी गई, तो वह भी हैरत में पडे़ थे। इसके बाद, उनसे इन कमेटियों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में शामिल होने का अनुरोध किया गया था। तारीख 28 मार्च, 2016 तय हुई, लेकिन इससे पहले 18 मार्च को बगावत हो गई। उपाध्याय का यहां तक दावा है कि यदि 28 मार्च को प्रस्तावित सम्मेलन पहले आयोजित हो जाता तो उस समय सरकार नहीं गिरती।

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