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आपातकाल के 45 वर्ष :वैद्यजी का आवास ही नहीं चिकित्सालय भी था गतिविधियों का केन्द्र

आपातकाल के 45 वर्ष :वैद्यजी का आवास ही नहीं चिकित्सालय भी था गतिविधियों का केन्द्र
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एटा । एएनएन (Action News Network)

25 जून 1975 को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल यूं तो पूरे देश के लिए ही घातक था। किन्तु इनमें भी इन्दिराजी द्वारा शत्रुवत समझे जानेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसके स्वयंसेवकों को तो आपातकाल के 19 माह काल की भांति थे।

रविशंकर प्रसाद पत्रकारिता विश्ववि​द्यालय के कुलपति बलदेव भाई शर्मा ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि 25 जून को जिस समय आपातकाल की घोषणा हुई उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद नगर में संघ का शिक्षावर्ग चल रहा था।

आपातकाल लगते ही ‘जल्द ही रा.स्व.संघ पर भी प्रतिबंध लगाया जाएगा ही’ इस आशंका से निर्धारित तिथि से एक दिन पूर्व ही वर्ग का समापन कर स्वयंसेवक अपने घर वापस भेज दिए गए। किन्तु वापस लौटते समय तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस को मार्ग में ही गिरफ्तार कर लिया गया।

बताया कि ऐसा करते ही स्वयंसेवकों पर शासकीय मशीनरी पशुवत टूट पड़ी। ऐसे में संघ के स्वयंसेवकों के सामने बड़ी चुनौती थी- स्वयं को गिरफ्तारी से बचाते हुए अपनी गतिविधियों को निरंतर चलाए रखना। इसमें समस्या तब खड़ी होती जब कोई आपत्ति-विपत्ति आती।

ऐसी ही आपत्ति का समय उस समय आया जब संघ प्रचारक दिनेशजी (बड़े दिनेशजी छर्रावाले) को टायफायड हो गया। अब क्या किया जाय। एक वारंटशुदा प्रचारक का गोपनीय रूप से कहां उपचार कराया जाय- इस विषय पर चिंतन हुआ तो स्मरण आये राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय भेंकुरी (अलीगढ़) में कार्यरत वैद्य श्यामबिहारी शास्त्री।

शास्त्रीजी से संपर्क कर उन्हें वस्तुस्थिति बताई तो वे केवल उपचार को ही नहीं, चिकित्सालय में भर्ती कर उपचार को तैयार हो गये। और फिर भेंकुरी का चिकित्सालय व वैद्यजी का आवास अलीगढ़ जनपद की आपातकाल विरोधी गतिविधियों का केन्द्र बन गया।

यह स्थिति तत्कालीन बीकेडी फरजन्द अली खान विधायक को वर्दाश्त न हुई। उन्होंने इसकी शिकायत थाने में कर दी। परिणाम, वैद्यजी अपना वेतन लेने सिकन्दराराऊ गये तो उन्हें थाने बुला लिया गया। सौभाग्य से वैद्यजी से सफल उपचार करानेवालों में तत्कालीन सांसद नेकराम शर्मा भी थे।

उन्हें जब इसका पता चला तो उन्होंने हस्तक्षेप कर 4 घंटा हिरासत में रहे वैद्यजी को छुड़ाया।
बताया कि 1928 में कार्तिक कृष्ण एकादशी को पं. सरदारसिंह के यहां जन्मे श्यामबिहारी का रा.स्व.संघ से परिचय उनके पीलीभीत के ललितहरि आयुर्वेदिक कालेज पीलीभीत से बीआईएमएस की शिक्षा ग्रहण करते समय वर्ष 1945 में वहां के जिला प्रचारक नारायणराव तर्टे के माध्यम से आया। इस दौरान वे पूरनपुर तहसील के विस्तारक भी रहे।

शास्त्री जी के ज्येष्ठ पुत्र आशुतोष मिश्र ने बताया कि 1948 में महात्मागांधी की हत्या के बाद लगे संघ पर प्रतिबन्ध के बाद जेल जानेवालों में शास्त्री जी भी थे। वे उस समय पीलीभीत में बीआईएमएस के चतुर्थ वर्ष के छात्र व पूरनपुर के विस्तारक थे। (वर्ष 1997 में पूरनपुर के स्वयंसेवकों ने अपने पुराने स्वयंसेवक के रूप में शास्त्रीजी का सम्मान भी किया था।)

बीआईएमएस उत्तीर्ण करने के बाद वे राजकीय सेवा में आ गये तथा मैनपुरी जिले के भारौल स्थित आयुर्वेदिक चिकित्सालय में आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में तैनात किये गये। चिकित्सक के रूप में शास्त्रीजी को आये कुछ ही समय हुआ कि किसी ने उनकी शिकायत कर दी। और इस शिकायत पर तत्काल कार्यवाही करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री सी.वी. गुप्ता ने उन्हें निलंबित कर दिया। आरोप था- ‘वे रा.स्व.संघ. के सदस्य हैं।’

हालांकि बाद में उच्च न्यायालय व ट्रिब्यूनल आदि के हस्तक्षेप से उनकी सवैतनिक बहाली हुई। किन्तु दण्डस्वरूप उन्हें तैनाती मिली हमीरपुर जिले की राठ तहसील के उस सीमावर्ती गांव ‘धगवां’ में जहां उन दिनों बैलगाड़ी से राठ से पहुंचने में 24 घंटा लगते थे।

1968 में एटा के जिला प्रचारक बनकर आये संघ के झण्डेवालान कार्यालय के प्रमुख स्व. सूर्यकृष्णजी बताते थे कि एटा में उनके प्रचारक काल में संघ का कार्यालय शास्त्री जी के अरूणानगर स्थित आवास में ही था।

बाद में मैनपुरी, एटा, अलीगढ़ आदि जनपदों के विभिन्न चिकित्सालयों में तैनात रह वैद्यजी जब 1980 में सेवानिवृत्त हुए तो विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ गये। यहां उन्हें प्रांतीय संस्कृत भाषा प्रमुख का दायित्व दिया गया।

इसी मध्य जब दीनदयाल धाम फरह (मथुरा) के आयुर्वेदिक चिकित्सालय में एक योग्य चिकित्सक की आवश्यकता हुई तो वे वहां भेज दिये गये। नेपाल में आयोजित ‘विश्व हिन्दू सम्मेलन’ में वे पूर्व राष्ट्रपति स्व. भैरोसिंह शेखावत के नेतृत्व में गये भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों में थे।

शास्त्री जी को अपने पितातुल्य माननेवाले जबलपुर के रविशंकर प्रसाद पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति तथा राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के पूर्व अध्यक्ष बल्देवभाई शर्मा मानते हैं कि उनका हाथ पकड़ मार्ग दिखा उन्हें वर्तमान स्थिति तक पहुंचानेवाले शास्त्री ही हैं।

शास्त्री जी की प्रेरणा से ही संघ के विभाग प्रचारक व बाद में विद्याभारती के संगठन मंत्री बने स्व. महेश जी का संघ से परिचय हुआ था। भव्य राममंदिर निर्माण का सपना देखने तथा रामजन्मभूमि आंदोलन में वर्ष 1990 में 20 दिन मैनपुरी जेल में रहनेवाले वैद्य श्यामबिहारी शास्त्री का 27 नवम्बर 1997 में स्वर्गवास हुआ।

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