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कोरोना का असर : गंगा किनारे लाश जलने में हुई 90 प्रतिशत से अधिक की कमी

कोरोना का असर : गंगा किनारे लाश जलने में हुई 90 प्रतिशत से अधिक की कमी
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बेगूसराय। एएनएन (Action News Network)

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण से हर कोई तबाह है। करीब-करीब सभी लोग घरों में कैद हैं। मंदिर-मस्जिद भी बंद है। इस दौरान श्मशान घाट में दिख रहे परिदृश्य के अनुसार यमराज भी होम क्वारेन्टाइन में चले गए हैं। यह नजारा दिखता है मिथिलांचल के विख्यात मोक्ष स्थली सिमरिया गंगा घाट पर। जहां की कोरोना केे कहर से पहले प्रत्येक दिन 50 से 60 लाश का अंतिम संस्कार होता था। लेकिन उसके बाद से रोज मुश्किल से तीन से चार लाश अंतिम संस्कार के लिए आ रही है। जिसके कारण श्मशान के राजा कहे जाने वाले मल्लिक समुदाय के साथ-साथ इससे जुड़े लोगों के भी रोजी-रोटी पर संकट आ गया है।

पहले जब 50 से 60 लाश यहां रोज आती थी तो अग्निदान देने के लिए मल्लिक (डोम) समुदाय के लोग नजराना लेते थे। इससे उनका परिवार चलता था। लाश के साथ वाले कपड़े और बांस बेचते थे। लाश जलने के बाद बचे कोयले का भी धंधा चलता था। लेकिन अब लाश ही नहीं आ रही है तो वह क्या नजराना लेंगे और क्या कपड़ा और कोयला बेचेंगे। सिमरिया गंगा घाट पर के किनारे इस समुदाय के 64 लोग अग्निदान की रस्म पूरी कराने में लगे रहते हैं। इससे जुड़े मुकेश मल्लिक बताते हैं कि हम लोग वंशावली के आधार पर पारंपरिक रूप से इस पेशे से जुड़े हुए हैं और इसी से रोजी-रोटी चलती है।

यहां अंतिम संस्कार करने के लिए बेगूसराय के अलावे समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, लखीसराय, जमुई तक से लोग आते थे। लेकिन लॉकडाउन के बाद गंगा किनारे स्थित मोक्ष स्थली श्मशान में सन्नाटा पसर गया है। मुश्किल से तीन-चार लाश रोज आती है, लग रहा है कि कोरोना के कहर से बचने के लिए यमराज भी होम क्वारेन्टाइन में चले गए हैं या फिर सोशल डिस्टेंसिंग से बचनेे के लिए यहां आने वालों की संख्या कम गई है।

लोग यहां जब दूर दराज से लाश जलाने आते तो थे मल्लिक समुदाय के साथ-साथ पंडा, पुरोहित, होटल व्यवसाय एवं ठेकेदार से जुड़े सैकड़ों परिवार की आजीविका इसी से चलती थी।हालांकि सिमरिया में लाश नहीं आने का दो प्रमुख कारण है कि सोशल डिस्टेंस के कारण अंतिम संस्कार में जाने के लिए कम लोग तैयार होते हैं। वाहन के अभाव में लोग अपने गांव के आस-पास बगीचा या किसी मृत नदी के किनारे भी अंतिम संस्कार की रस्म अदा कर रहे हैं। और दूसरा कारण है कि मरने वालोंं की संख्या में कमी आई है।

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