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श्रीराम मंदिर कारसेवा: एक साल की सजा भी कम है 'श्रीराम' के लिए, स्वर्णाक्षरों में लिख गया इतिहास

श्रीराम मंदिर कारसेवा: एक साल की सजा भी कम है श्रीराम के लिए, स्वर्णाक्षरों में लिख गया इतिहास
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  • कारसेवक की जुबानी, जेल में लगने लगी शाखा, मिला भोजन विभाग तो होने लगा 'भोजन मंत्र'

  • कारसेवकों पर गोली चलने व मरने की सूचना पर रो पड़े कारसेवकदयाशंकर गुप्ता

सुलतानपुर । एएनएन (Action News Network)

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू होने की खबर से सनातन संस्कृति को मानने वाले हर कोई प्रसन्न है। जो कारसेवा से जुड़े रहे, उनमें तो अपार खुशी की लहर है। एक श्रीरामभक्त कारसेवा के दिनों को याद करते हुए भावुक हो उठे और कहा कि श्रीराम के लिए एक महीने तक जेल में रहने की सजा भी कम है। श्रीराम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण से गुलामी के सारे कलंक मिट गए। स्वर्णाक्षरों में इतिहास लिख गया, यह कहते हुए उनके आंख से खुशी से आँसू छलक पड़े।

अयोध्या कारसेवा में अपनी भूमिका अदा करने वाले जिले के कादीपुर तहसील निवासी रमाकांत बरनवाल उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला प्रचार प्रमुख का दायित्व निभा रहे थे। वे हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी से बातचीत में कहा कि युवा अवस्था में एक जोश व जुनून था। 1990 की याद एक बार फिर ताजा हो गयी है। जिस समय पूरे देश मे कारसेवा का अभियान चल रहा था। पुलिस प्रशासन की नींद उड़ी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों पर पुलिस की खास नजर थी।

दीपावली के पूर्व जिले के सभी मंदिरों में दीप जलाने की योजना चल रही थी। पुलिस पीछे पड़ी थी। मैंने कहा कि मैं थाना दीपावली के बाद ही चलूंगा। पुलिस दीपावली बीतने के अगले दिन फिर घर पर आ धमकी, मैं घर से चार दिन के भाग निकला। वापस आया तो पुलिस फिर आ धमकी। कहा साहब बुला रहे हैं। अपने दो अन्य साथी के साथ पुलिस अपने साथ ले गयी। पुलिस ने कहा कि लिखकर दे दो कारसेवा से हमारा कोई वास्ता नहीं है। यही से छोड़ दूँगा। मैंने कहा कि श्रीराम के लिए जेल की सजा काटने के लिए तैयार हूँ। दो दिन अमहट जेल में बंद कर दिया गया। इसके बाद बाराबंकी जेल में शिफ्ट कर दिया गया।

मैं जेल में, घर पर कारसेवकों की होती रही सेवा

उन्होंने कहा कि वही दूसरी तरफ कादीपुर घर पर मेरी अनुपस्थिति में कारसेवकों की सेवा में लोग जुटे थे। उनको भोजन जलपान कराया जा रहा था। मुझे खुशी थी। कोई भूखा रामभक्त न रहे, क्योंकि ये सारी सेना राम की सेना है।

बाराबंकी जेल की घटना को सुनाते हुए रमाकांत बरनवाल ने कहा कि एक महीने का समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। वहां पर पूर्व डीजीपी श्रीश चन्द्र दीक्षित जो उस समय विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी थे। गौरीगंज के दादा पूर्व विधायक तेजभान सिंह, बनखंडी आश्रम के महंत बनखंडी महाराज, रामविलास वेदांती, अमेठी के भाजपा नेता कर्मराज सिंह, डॉ जितेंद्र अग्रवाल सहित एक साथ लगभग पचास लोग थे।

जेल में लगने लगी शाखा, मिला भोजन विभाग तो होने लगा 'भोजन मंत्र'

रमाकांत बरनवाल बताते हैं कि सभी कारसेवक जेल में एक साथ रहने लगे। हमलोग सुबह शाखा लगाने लगे। कुछ दिन बिना 'ध्वज' के शाखा लगाए, इसके बाद जेल अधीक्षक से आग्रह करके भगवाध्वज की व्यवस्था की गई। शाखा लगने के बाद आनंद आने लगा। शाखा के समय अन्य बैरक के लोग भी साथ आ जाते थे। शाम को बैडमिंटन होता था। इसी बीच अयोध्या में कर्फ्यू लग गया। कारसेवकों का हुजूम अयोध्या कूच कर रहा था।

कारसेवकों पर गोली चलने व मरने की सूचना पर रो पड़े कारसेवक

बताया कि पूरे देश से अयोध्या पहुंच रहे कारसेवकों पर मुलायम सरकार ने गोली चलवा दी। जब यह सूचना मिली कि बहुत से कारसेवक मारे जा रहे हैं, तो श्री दीक्षित रो पड़े। सभी कारसेवक भावुक हो उठे, जेल प्रशासन मनाने में लग गया। दीक्षित जी ने कहा कि आखिर कारसेवकों का क्या दोष था। क्यों मारा गया। उन्हें वापस ले आओ। रात भर हमलोग बैठे रहे। जेल प्रशासन आग्रह करता रहा सो जाइये। आखिर हम कैसे सो सकते हैं। कार सेवक मारे जा रहे हैं। घायल हो रहे हैं। उनके साथ अत्याचार किया जा रहा है। अब तो साफा बांधकर निकल पड़े हैं। मुलायम जो करना हो कर ले। अंत में पता चला ढांचे पर भगवाध्वज फहराया गया। जेल में गूँजने लगे जयश्रीराम के नारे। खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहा। बस मलाल इतना ही है उस कारसेवा में नहीं जा सके, लेकिन 1992 की कारसेवा में आयोध्या में ही डटे रहे।

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