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नमक कानून भंग करने के दौरान जल गया हाथ, लेकिन छूटा नहीं कड़ाह

नमक कानून भंग करने के दौरान जल गया हाथ, लेकिन छूटा नहीं कड़ाह
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बेगूसराय । एएनएन (Action News Network)

90 साल पहले 21 अप्रैल 1930 का वह दिन तत्कालीन मुंगेर जिले के सुदूरवर्ती गढ़पुरा (वर्तमान में बेगूसराय जिला) का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दर्ज हो गया, जब अंग्रेजों के लाख प्रयास के बावजूद बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह ने नमक बनाकर अंग्रेजों का कानून भंग कर दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन की गाथा की कड़ी में वह एक अविस्मरणीय दिन था जब मुंगेर के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी के आह्वान पर बैठक हुई।

इसमें जिले भर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था। बैठक बुलाने का मुख्य उद्देश्य था नमक कानून तोड़ने के लिए कार्य स्थल का चयन। गढ़पुरा से नेतृत्वकर्ता रहे बिंदेश्वरी सिंह, दामोदर सिंह, महावीर सिंह ने एक स्वर से इस कार्य के लिए खचाखच भरे हॉल में गढ़पुरा का नाम प्रस्तावित किया और लंबी चर्चा के बाद मुंगेर जिले के उत्तरी छोर पर स्थित गढ़पुरा में नमक बनाने का कार्यक्रम सुनिश्चित हुआ। 17 अप्रैल 1930 को मुंगेर के कष्टहरणी घाट में नमक सत्याग्रह की शपध लेकर श्री बाबू अपने सहयोगियों के साथ गंगा पार कर गढ़पुरा के लिए रवाना हो गये, उन्हें विदा करने के लिए गंगा तट पर हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।

तीन दिनों बाद पैदल यात्रा कर मां भारती के वीर सपूतों की टोली 20 अप्रैल की शाम गढ़पुरा पहुंची। पूरे रास्ते लोग यात्रा में जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया।यहां पहुंचते-पहुंचते भी हजारों की भीड़ हो चुकी थी। रात्रि ठहराव स्थल के लिए गढ़पुरा गांव की रामजानकी ठाकुरबाड़ी का चयन किया गया था। इधर नमक आंदोलन की तैयारी देख प्रशासन भी मुस्तैद था। पूूूरे जिले में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया गया था और गढ़पुरा के लिए डीएसपी के नेतृत्व में बेगूसराय अनुमंडल के दस्ते को यहां भेज दिया गया।

21 अप्रैल की सुबह सूर्योदय होते ही डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में नमक बनाने का कार्य एक कड़ाह में प्रारंभ हुआ। गांधी जी का कहना था 'मुट्ठी टूट जाए मगर कड़ाह न छूटे' और इसी प्रण के साथ काम भी हो रहा था। जिस समय नमकीन पानी खौल रहा था, उसी समय डीएम ली. साहब एवं एसपी मथुरा प्रसाद के आदेश पर फिरंगी सिपाहियों ने सभी सामानों को तितर-बितर करना चाहा। तब मां भारती के वीर सपूतों ने कड़ाह को चारों ओर से घेर लिया, इसी क्रम में सिपाहियों ने कड़ाह को जबरन उलट दिया जिससे कई लोग घायल हुए, लेकिन श्री बाबू को कड़ाह पकड़ा देख कोई भी कड़ाह छोड़ने को तैयार नहीं हुआ।

अंग्रेज सिपाहियों का यह जुल्म देख लोग आक्रोशित तो हुए, मगर श्री बाबू ने बड़े धैर्य से लोगों को दिलासा दिया और कहा कि 'चाहे गोरी सरकार गोली से उड़ा दे मगर आप में से कोई नौजवान इसका प्रतिकार नहीं करेंगे'। कड़ाह पर गिर जाने के कारण श्री बाबू बुरी तरह से झुलस गए, लेकिन सत्याग्रह 30 दिनों तक चलता रहा। नमक की पुड़िया बनाकर जिले भर के कांग्रेसियों को भेज, उनसे सहयोग राशि लेकर सत्याग्रह जारी रहा। सत्याग्रह से लौटते समय बेगूसराय से उन्हें गिरफ्तार कर बखरी डाक बंगला लाया गया, और वहीं पर कोर्ट लगाकर छह माह के लिए जेल भेज दिया गया।

कई सत्याग्रहियों के साथ शीशा पिलाने जैसा कुकृत्य भी किया गया। यहां बताते चलें कि बेगूसराय कभी मूकदर्शक नहीं रहा और इतिहास के घटनाक्रम को सदा प्रभावित करता रहा। यह अपनी सांस्कृतिक विरासत, संपन्नता, राजनीतिक चेतना और क्रांतिकारी विचारधाराओं के लिए सदा से जाना जाता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी यहां के लोगों ने उत्कृष्ट भूमिका निभाई। तभी तो गांधीजी के आह्वान पर नमक सत्याग्रह आंदोलन में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया तथा नमक पर टैक्स लगानेे के विरोध में बिहार में सबसे पहले गढ़पुरा में नमक कानून भंग किया गया । इसी के साथ गढ़पुरा का नाम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दर्ज हो गया।

गढ़़पुरा के इसी ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह के बाद महात्मा गांधी ने श्रीबाबू को बिहार का प्रथम सत्याग्रही कहा था और वे राष्ट्रीय पटल पर छा गए। यहां स्थापित बिहार केसरी की प्रतिमा और सत्याग्रह स्थल की दीवारों पर उकेरी गई सत्याग्रह की प्रतिमूर्ति हर क्षण-हर दिन यहां आने वाले लोगों को आजादी के आंदोलन की याद दिला रही हैंं।

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