कारोबार

Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर देशभर में 40 हजार करोड़ से ज्यादा के कारोबार की उम्मीद

नई दिल्ली
 देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां जोरों पर है। बड़े पैमाने पर लोग खरीदारी कर रहे हैं। घरों और मंदिरों को सजाया है। जन्माष्टमी सिर्फ आस्था का ही त्योहार नहीं है, बल्कि भारत की 'सनातन अर्थव्यवस्था' का एक जीता-जागता प्रतीक है। इस वर्ष जन्माष्टमी के दौरान देशभर में 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा व्यापार होने की उम्मीद की जा रही है। रक्षाबंधन के दौरान हुए जबरदस्त व्यापार के बाद इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर देशभर में 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा व्यापार होने का अनुमान है। 

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) की ओर से यह अनुमान अलग-अलग सेक्टर में होने वाली संभावित बिक्री, घर और धार्मिक कामों के लिए खरीदारी, मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर होने वाले खर्च, देशभर में बड़े पैमाने पर होने वाले जश्न और धार्मिक पर्यटन से जुड़े खर्चों पर आधारित है। सीएआईटी के सेक्रेटरी जनरल और भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव सिर्फ भक्ति और आस्था का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारत की संस्कृति, परंपराओं, सामाजिक भागीदारी और आर्थिक गतिविधियों का एक अद्भुत संगम भी है। जन्माष्टमी एक अनोखा त्योहार है जहां आस्था सीधे तौर पर आर्थिक गतिविधियों में बदल जाती है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "वोकल फॉर लोकल" (स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने) के आह्वान का असर देश भर के त्योहारों वाले बाजारों में साफ दिख रहा है। भारतीय उत्पादों को ज्यादा प्राथमिकता मिल रही है। जिससे स्थानीय व्यापार, कुटीर उद्योगों, हस्तशिल्प और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को काफी बढ़ावा मिल रहा है। पूजा के सामान से लेकर सजावट और धार्मिक उत्पादों तक, जन्माष्टमी के दौरान स्वदेशी सामान की भारी मांग रहती है।

प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि जन्माष्टमी से जुड़ी हर रस्म और जश्न लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। किसान, डेयरी उत्पादक, फूल उगाने वाले, मिठाई बनाने वाले, कपड़े के व्यापारी, मूर्तिकार, कारीगर, महिला उद्यमी, ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर, होटल और रेस्टोरेंट के मालिक और कई तरह की सेवाएं देने वाले लोग इस त्योहार से सीधे या परोक्ष रूप से फायदा उठाते हैं।

सीएआईटी के अनुसार, 2024 में जन्माष्टमी के दौरान व्यापार लगभग 25 हजार करोड़ रुपए था और 2025 में यह बढ़कर लगभग 30 हजार करोड़ रुपए हो गया। इस वर्ष, ग्राहकों की ज्यादा मांग, सामान और सेवाओं की कीमतों में बदलाव, बढ़ते सामाजिक उत्सव, धार्मिक पर्यटन में बढ़ोतरी, और मॉडर्न रिटेल व डिजिटल कॉमर्स के विकास के कारण, व्यापार में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि होने और इसके 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा होने की उम्मीद है।

प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि इस साल जिन उत्पादों की मांग खास तौर पर ज्यादा है, उनमें माखन-मिश्री, दूध, दही, पनीर और अन्य डेयरी उत्पाद, मिठाइयां, फल, सूखे मेवे, पूजा का सामान, फूलों की मालाएं, सजावटी तोरण, झूले, लड्डू गोपाल की मूर्तियां, मुकुट, बांसुरी, मोर पंख, आभूषण और त्योहार के खास कपड़े शामिल हैं।

खंडेलवाल की ओर से इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय त्योहारों को सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन मानना ​​उनके असली महत्व को कम करके आंकना होगा। दिवाली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, करवा चौथ, छठ पूजा और कई अन्य त्योहार लाखों व्यापारियों, कारीगरों, शिल्पकारों, किसानों, महिला उद्यमियों, स्वरोजगार करने वाले लोगों और सेवा प्रदाताओं के लिए आर्थिक अवसरों का एक बड़ा नेटवर्क बनाते हैं।

जन्‍माष्‍टमी पर कहां कितना खर्च करेंगे लोग? 

कैट के आकलन के अनुसार जन्माष्टमी से जुड़े व्यापार में कई चीजों की हिस्‍सेदारी रहने वाली है. खंडेलवाल ने बताया कि इस वर्ष बाजारों में माखन-मिश्री, दूध, दही, पनीर और अन्य डेयरी उत्पादों, मिठाइयों, फलों, सूखे मेवों, पूजा सामग्री, फूल-मालाओं, बंदनवार, झूलों, लड्डू गोपाल की मूर्तियों, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, आभूषणों और विशेष परिधानों की मांग विशेष रूप से बढ़ी हुई है। 

मिठाई, माखन-मिश्री और डेयरी उत्पाद पर 20% तो पूजा सामग्री, धूप-अगरबत्ती, पंचामृत और पूजन किट पर 10% खर्च कर सकते हैं. वहीं फूल, मालाएं और सजावट सामग्री पर 12%, पारंपरिक परिधान और वस्त्र पर 10%, फल, सूखे मेवे और प्रसाद सामग्री पर 10% खर्च किया जा सकता है. लड्डू गोपाल की मूर्तियां, झूले और श्रृंगार सामग्री पर 8%, उपहार, खिलौने और घरेलू सजावटी सामग्री पर 5%, धार्मिक पर्यटन, होटल, परिवहन और अन्य सेवाओं पर 15% और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं पर 10% खर्च कर सकते हैं। 

राष्‍ट्रीय महामंत्री बोले- वोकल फॉर लोकल की ताकत 
कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं चांदनी चौक से सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव केवल श्रद्धा और भक्ति का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारत की संस्कृति, परंपरा, सामाजिक सहभागिता और आर्थिक गतिविधियों का अद्भुत संगम भी है. जन्माष्टमी ऐसा पर्व है, जिसमें आस्था सीधे आर्थिक गतिविधियों में परिवर्तित होती दिखाई देती है। 

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए “वोकल फॉर लोकल” के आह्वान का प्रभाव त्योहारों के बाजारों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. अब उपभोक्ता बड़ी संख्या में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे स्थानीय व्यापार, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को व्यापक लाभ मिल रहा है। 

किसान, फल-फूल विक्रेता से होटल-रेस्‍तरां व्‍यवसाई तक को लाभ  
जन्माष्टमी के अवसर पर पूजा सामग्री से लेकर सजावटी वस्तुओं और धार्मिक उत्पादों तक अधिकांश मांग स्वदेशी वस्तुओं की है. खंडेलवाल ने कहा कि जन्माष्टमी से जुड़ा प्रत्येक अनुष्ठान और आयोजन किसी न किसी रूप में लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है. किसान, दुग्ध उत्पादक, फूल उत्पादक, मिठाई कारोबारी, वस्त्र विक्रेता, मूर्तिकार, कारीगर, महिला उद्यमी, ट्रांसपोर्टर, होटल व्यवसायी, रेस्तरां संचालक और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोग इस पर्व से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। 

2024 में 25,000 करोड़, 2025 में 30,000 करोड़ का कारोबार 
कैट के अनुसार वर्ष 2024 में जन्माष्टमी के अवसर पर देशभर में लगभग ₹25,000 करोड़ का व्यापार हुआ था, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग ₹30,000 करोड़ तक पहुंच गया. इस वर्ष उपभोक्ता मांग में वृद्धि, वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन, त्योहारों के बढ़ते सामाजिक विस्तार, धार्मिक पर्यटन में वृद्धि और आधुनिक रिटेल एवं डिजिटल खरीदारी के विस्तार को देखते हुए लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि के साथ व्यापार ₹40,000 करोड़ से अधिक रहने का अनुमान है। 

सनातन अर्थव्‍यवस्‍था की ताकत 
उन्‍होंने कहा कि भारत के त्योहारों को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजनों के रूप में देखना उनके वास्तविक महत्व को कम करके आंकना होगा. दीपावली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, करवा चौथ, छठ पूजा सहित देश के सभी प्रमुख पर्व करोड़ों छोटे व्यापारियों, कारीगरों, शिल्पकारों, किसानों, महिलाओं, स्वरोजगारियों और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए आर्थिक अवसरों का विशाल तंत्र तैयार करते हैं। 

खंडेलवाल ने कहा कि भारतीय त्योहारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें होने वाला खर्च केवल उपभोग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों तक आय और रोजगार के रूप में पहुंचता है. यही प्रक्रिया भारत की जमीनी, समावेशी और विकेंद्रीकृत ‘सनातन अर्थव्यवस्था' को मजबूती प्रदान करती है। 

मथुरा-वृंदावन से गुजरात-महाराष्‍ट्र तक जन्‍माष्‍टमी की धूम 
खंडेलवाल ने बताया कि जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा-वृंदावन, द्वारका, नाथद्वारा, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, इंदौर और देश के अन्य प्रमुख कृष्ण मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। 
वहीं महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित देश भर में यह त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है. इससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और होटल, परिवहन, रेस्तरां, प्रसाद, फूल, स्थानीय हस्तशिल्प और अन्य सेवाओं में भी उल्लेखनीय आर्थिक गतिविधियां देखने को मिलेंगी। 

उन्होंने कहा कि भारत की धार्मिक अर्थव्यवस्था को अब केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि रोजगार, पर्यटन, स्थानीय उत्पादन और छोटे कारोबार के एक बड़े आर्थिक इकोसिस्टम के रूप में भी समझने की आवश्यकता है। 
खंडेलवाल ने कहा, 'जन्माष्टमी का उत्सव ‘भक्ति से बाजार, परंपरा से रोजगार और स्थानीय उत्पादन से राष्ट्रीय विकास' की भावना को सशक्त बनाने का अवसर है. जन्माष्टमी सहित सभी त्यौहार भारत की उस अद्भुत आर्थिक परंपरा का प्रतीक है, जहां मंदिर से बाजार तक, किसान से व्यापारी तक और कारीगर से उपभोक्ता तक पूरा समाज एक आर्थिक श्रृंखला में जुड़ जाता है। 

उन्होंने कहा कि भारतीय त्योहारों की सबसे खास बात यह है कि इन मौकों पर होने वाला खर्च सिर्फ उपभोग तक सीमित नहीं रहता; बल्कि यह आय और रोजगार के रूप में समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचता है। यह प्रक्रिया भारत की जमीनी स्तर की, समावेशी और विकेंद्रीकृत "सनातन अर्थव्यवस्था" को मजबूत करती है।

खंडेलवाल ने कहा कि जन्माष्टमी के दौरान लाखों श्रद्धालु देश भर में अलग-अलग तरीकों से यह त्योहार मनाएंगे, खासकर मथुरा-वृंदावन, द्वारका, नाथद्वारा, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, इंदौर, यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ और कृष्ण के अन्य प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर। इससे धार्मिक पर्यटन को काफी बढ़ावा मिलेगा और होटल, ट्रांसपोर्ट, रेस्टोरेंट, प्रसाद की बिक्री, फूलों, स्थानीय हस्तशिल्प और संबंधित सेवाओं में अच्छी-खासी आर्थिक गतिविधि होगी।

उन्होंने कहा कि भारत की 'धार्मिक अर्थव्यवस्था' को अब सिर्फ आध्यात्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक बड़े आर्थिक इकोसिस्टम के तौर पर भी पहचाना जाना चाहिए जो रोजगार, पर्यटन, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और छोटे व्यवसायों को सहारा देता है।

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