
278 मिमी बारिश के बाद भी प्यासा रामगढ़ बांध, अवैध निर्माणों पर अब चलेगा प्रशासन का बुलडोजर
जयपुर
कभी मानसून की पहली फुहार के साथ सैलानियों से गुलजार रहने वाला रामगढ़ बांध इन दिनों एक अजीब विरोधाभास की तस्वीर पेश कर रहा है। एक तरफ अरावली की पहाड़ियां हरियाली की चादर ओढ़ चुकी हैं, वहीं दूसरी ओर बांध की पाल अब भी पानी का इंतजार कर रही है। इस बीच, प्रशासन ने बांध के कैचमेंट और बहाव क्षेत्र में बने अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। रामगढ़ क्षेत्र में इस मानसून में अब तक 278 मिमी बारिश दर्ज की जा चुकी है। शुक्रवार को 26 मिमी बारिश भी हुई, लेकिन इसके बाद भी बांध प्यासा है।
इधर, एक्शन की तैयारी
रामगढ़ बांध के प्यासा रहने का सबसे बड़ा कारण इसके पानी के बहाव क्षेत्र में बने अवैध निर्माण, अतिक्रमण और अनधिकृत एनिकेट्स हैं, जो बारिश के पानी को बांध तक पहुँचने से रोक रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए अब प्रशासन ने बहाव क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने की तैयारी शुरू कर दी है।
13 अगस्त को इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। इससे पहले जिला प्रशासन ने जेडीए और संबंधित उपखंड अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं। जिला कलक्टर के आदेश के बाद जेडीए की प्रवर्तन शाखा ने भी बैठक कर रणनीति तैयार की है। संयुक्त सर्वेक्षण में बहाव क्षेत्र में कई अवैध निर्माण सामने आए हैं, जिनका रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है।
क्यों खर्च किया जा रहा पैसा?
करीब ढाई करोड़ रुपए की लागत से बांध की पाल और सड़क की मरम्मत का काम कराया गया है। इसके बावजूद यहां पर्यटन गतिविधियों को अब तक रफ्तार नहीं मिल सकी है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए साल 1982 में आरटीडीसी की ओर से यहां झील टूरिस्ट विलेज शुरू किया गया था। हालांकि, लगातार घाटे में चलने के कारण साल 2016 में इसे बंद कर दिया गया। इसे बंद हुए करीब एक दशक हो चुका है, लेकिन अब तक इसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सका है। ऐसे में मरम्मत पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद यहां पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशें धरातल पर ज्यादा असरदार नजर नहीं आ रही हैं।
पानी नहीं, इसलिए सूनी है पाल
बांध की पाल और आसपास के इलाके में इस बार मानसून की वह चहल-पहल दिखाई नहीं दे रही है। स्थानीय लोगों की मानें तो पिछले साल झरनों में करीब तीन महीने तक पानी बहता रहा था। बड़ी संख्या में लोग यहां घूमने पहुंचते थे और पाल पर मेले जैसा माहौल रहता था। इस बार पहाड़ियों पर हरियाली तो लौटी है, लेकिन पानी नहीं आया।




